परिवर्तन ही प्रकृति है।
परिवर्तन ही प्रकृति है।
वक़्त कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता। बचपन से युवावस्था का सफर इतना अल्पकालीन होता है कि, आभास ही नहीं होता कब हमारा बचपन हमसे दूर हो गया। समय निर्बाध रूप से चलता जाता है और हम परिवर्तित होते जाते हैं, प्रगति करते जाते हैं। साथ ही आसपास की हर वस्तु परिवर्तित होती रहती हैं।
उदाहरण हमारे सम्मुख है, कल तक इस विद्यलाय में जो विद्यार्थी थे वे आज नहीं हैं या आज जो विद्यार्थी हैं कल वे प्रगति कर आगे बढ़ जायेंगे और उनका स्थान नए विद्यार्थी ग्रहण कर लेंगे। इसी भांति अध्यापक भी जो आज हैं संभवतः वे कल अन्यत्र विद्यालय में दूसरे विद्यार्थियों को अपने ज्ञान से सिंचित कर रहे हों या जो कल तक थे आज वे अन्यत्र चले गए हैं।
समय का चक्र इसी भांति चलता है और अपने साथ परिवर्तन लाता है। कल तक इस विद्यालय की जिन इमारतों की यादें हमने संजोये रखी हैं आज उनमे भी परिवर्तन हो गया है। अपने विद्यालय की प्रगति को देखकर हृदय मानो प्रसन्नता से गद-गद हो उठता है और इच्छा होती है कि समय के इस चक्र में अतीत में जाकर ढेरों यादें और बटोरकर लाते और इन यादों के सिलसिलों में यादों के कुछ पन्ने और जोड़ दें एवं अतीत में जाकर उन क्षणों को फिर से जीवित कर उनका भरपूर आनंद उठायें, जो क्षण हमने उस वक़्त नज़रअंदाज कर दिए उन्हें अब जियें और सदा के लिए अपने हृदय में संजो लें।




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