अविस्मरणीय पल
अविस्मरणीय पल
कहते हैं की, बचपन सबसे सुहाना और यादगार होता है, लेकिन मेरा मानना कुछ और ही है। मेरी नज़रों में सबसे अहम और अविस्मरणीय पल मेरे विद्यालय से जुड़े हैं। विद्यालय की वो कक्षाएं जिनमे अकसर हम बैठा करते अपने सहपाठियों के साथ, हंसी-मजाक भी करते और साथ-साथ पढाई भी करते। एक-दूसरे की टांग भी खींचते और जरुरत पड़ने पर अपने सहपाठियों की सहायता भी करते। अध्यापक आते, हमें पढ़ाते, कभी-कबार हम लोगों के साथ हंसी-मजाक वो भी कर लिया करते। हमारी गलतियों पर हमें डाँटते और हमारे अच्छे कार्यों पर हमें पुरस्कृत भी करते, जहाँ पर हम लड़खड़ा जाते तो हमारा हौंसला भी बढ़ाते। कभी सोचते हैं, अगर ये विद्यालय न होता, ये अध्यापक न होते तो हमारे जीवन की धुरी क्या होती?
यदि हम जीवन में सफल होते हैं तो हमारे माता-पिता के अतिरिक्त अध्यापक सबसे ज्यादा खुश होते हैं और गर्व से कहते हैं, "ये मेरी/मेरा शिष्या/शिष्य है।" अगर हम असफल भी होते हैं तो जितने निराश हम होते हैं उतने ही हमारे अध्यापक भी निराश होते हैं।
हर किसी के अपने-अपने अनुभव होते हैं लेकिन विद्यालय से हमें जो अनुभव प्राप्त होते हैं वे सदा ही स्मरणीय और ज्ञानवर्धक होते हैं।
विद्यालय हमें वह मंच प्रदान करता है जिसपर हमारा संपूर्ण भविष्य आधारित होता है या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो विद्यालय हमारे जीवन की आधारशिला होता है, जिसके बिना हम एक सफल जीवन की कप्लना मात्र भी नहीं कर सकते हैं।



Bahut acha
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