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पाठशाला

पाठशाला
मानव जन्म लेता है और जन्म लेते ही सीखने का सिलसिला शुरू हो जाता है। रोना, हंसना, बोलना, चलना, खाना इत्यादि कई सारी चीजें बचपन में सिखाई जाती हैं माँ के द्वारा, परिवार के द्वारा इसीलिए माँ और परिवार को बच्चे की पहली पाठशाला कहा जाता है। इसके बाद एक निश्चित उम्र के बाद बच्चे को उसकी दूसरी पाठशाला भेजा जाता है। इस पाठशाला का एक निश्चित स्वरुप होता है और हम इसे "विद्यालय" के नाम जानते हैं। यह भी परिवार की ही भांति होता है तभी तो इसे "विद्यालय परिवार" का नाम दिया जाता है। यहाँ व्यक्ति शिक्षा ग्रहण करता है और साथ ही साथ उसके व्यक्तित्व का विकास होता है। विद्यालय मनुष्य को जीवन की एक नई राह की ओर ले जाता है। विद्यालय से प्राप्त शिक्षा/ज्ञान ताउम्र मनुष्य का साथ देते हैं।
अतीत में शिक्षा हेतु गुरुकुलों और आश्रमों की व्यवस्था की गयी थी और शिक्षक को "गुरु" कहा जाता था, जिसका स्थान माता और पिता के बाद तीसरा होता था। वर्तमान में गुरुकुलों का स्थान विद्यालयों ने ले लिया है। काम तो वही है बस व्यवस्था में कुछ परिवर्तन हो गए हैं। अब गुरु को "शिक्षक" कहा जाता है। लेकिन, अभी भी कुछ ऐसे विद्यालय अस्तित्व में हैं जहाँ शिक्षक को सम्मान के साथ "गुरूजी" कहा जाता है। ऐसा ही एक विद्यालय हमारे इलाके में है- "राजकीय इण्टर कॉलेज मठकुड़ी सैंण", जहाँ विद्यार्थी आज भी शिक्षक को सम्मान और शिष्टता के साथ 'गुरूजी' कहते हैं। यह भावना हमारे अतीत को वर्तमान के साथ आज भी जोड़कर रखती है।

 

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